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अहसास

अध्याय-1

                  हैलो..........हैलो........... ,            थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद दबे से स्वर में आवाज आती है........., हैलो.................... मैं राज बोल रहा हूँ, क्या तुम मुझे सुन रही हो । हाँ सुन रही हूँ, पहचाना मुझे, पिया बोल रही हूँ। अपना परिचय देने की जरूरत नहीं है, मैंने पहचान लिया। राज को सुनने के बाद पिया बोली, कैसे पहचाना तुमने, मेरा नया नम्बर तो है ही नहीं तुम्हारे पास,  और मैंने तुम्हारे पास पूरे दो साल बाद कॉल किया है।

                राज की फीकी सी हसी निकल पड़ती है। “हंस क्यूं रहे हो, मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे तुम्हें हंसी आये।” इस पर राज कहता है, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, बस ऐसे ही, तुम ये बताओ पिया, तुमने मुझे क्यों याद किया।

                थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद पिया बोलती है, “राज ये बताओ, तुम्हें हसी क्यों आयी”। देखो पिया तुमने मुझे 2 साल नहीं, पूरे 2 साल 1 महीना और 4 दिन के बाद कॉल किया है। राज के ये शब्द कहने के बाद पिया कहती है, तुम अपनी रामायण मत गाओ, जो पूछ रहीं हूँ, सीधे-सीधे बोलो, नहीं तो कॉल कट कर रहीं हूँ, अबकी बार तो कॉल कर लिया, लेकिन तुमने अभी मुझे अपनी हसी का कारण नहीं बताया तो समझ लेना अगला कॉल तुम्हें आएगा ही नहीं।

                पिया इतना कहने के बाद रुक गई और राज के बोलने का इन्तजार करने लगी। राज को समझ नहीं आ रहा था कि बस उसके बेरुखे से कहकहे में पिया क्या मतलब निकाल रही है। सोच रहा था कि पिया के आज भी वही तेवर, वही गुस्सा..............।

                लेकिन राज जानता है, कि पिया को पता है, कि “राज” यानी वो स्वयं, पिया की किसी बात को नकारेगा नहीं, चाहे उसके लिए राज को झूठ ही क्यों ना बोलना पड़े।

                अच्छा सुनो पिया, हंसा इसलिए था, क्योंकि मुझे लग रहा है तुम अभी भी पागल हो । इस पर पिया कहती है, क्या सच में तुम्हें मैं पागल लगाती हूँ, अब तुम्हारी खैर नहीं।

                राज फिर से बात को नये सिरे से शुरु करते हुए कहता है, अच्छा अब ये बताओ किस लिए कॉल किया, कोई काम है, या कुछ और।

                राज के पूछने पर पिया ने कहा, “कुछ नहीं, बस कल तुम्हारे शहर जयपुर में आ रही हूँ, तो सोचा तुमसे भी मिल लूं । काम के कारण तुम्हें पता है, समय तो मिलता नहीं।“ “क्या सच में पिया, तुम मुझसे मिलना चाहती हो।”

                हाँ, राज कल मैं तुम्हें कॉल करती हूँ और पिया ने कॉल काट दिया।

                राज कुछ समझ नहीं पाया कि पिया आखिर क्यूँ मिलना चाहती है, और यदि मिलना ही था, तो फिर इतने दिनों तक नाराजगी क्यों। खैर राज ने और अधिक नहीं सोचा और कल का इन्तजार करने लगा।

                दूसरे दिन शाम के करीब 4 बज रहे थे, राज का फोन बजने लगा, उस दिन राज ने जितनी बार उसका फोन बजा, उतनी ही बार बस पिया का ही खयाल आया था, लेकिन ये कॉल सच में पिया का था।

                पिया के  कुछ बोलने से पहले ही राज बोल पड़ा, “कहां हो पिया”, पिया को जयपुर के बारे में अधिक पता नहीं था, इसलिए उसने एक बुजुर्ग से पूछकर राज को बताया कि मैं यहाँ गोविन्द देव जी मंदिर पर तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ। राज ने पिया के पास पहुँचने में अधिक देर नहीं की, राज ने पिया को जब पूरे 2 साल और 1 महीने बाद देखा तो सड़क के दूसरी तरफ था। राज को पिया को देखने के बाद बहुत खुशी हुई थी, राज की धड़कनें बढ़ गई थी उसे देखने में और उस अदभुत खुशी में।

                “पिया,”   राज ने जैसे ही पिया को आवाज दी, तो पिया चौंक पड़ी, क्यूंकि उसे अन्दाजा नहीं था कि राज उसे इतनी करीब आकर इस तरह आवाज देंगे।

                पिया ने राज से मिलने के बाद हालांकि अधिक खुशी व्यक्त नहीं की थी, फिर भी पिया की एकटक नजरों से राज को देखना पिया की चोरी को छुपा नहीं पा रही थी। राज ने अगले पल पिया को चलने को कहा। पिया बिना कुछ बोले राज के साथ बैठ गई थी, उसके साथ चलने के लिए, लगभग आधे घंटे के सफर के बाद राज और पिया, दोनों राज के घर पहुँच चुके थे।

                घड़ी की सुइयों के हिसाब से राज और पिया आधे घंटे में जरूर पहुँच चुके थे। लेकिन पिया इस थोड़े से समय में ही बहुत कुछ याद आ गया था।

                पिया सोच रही थी कि राज उससे बात करेंगे, लेकिन राज का ध्यान शायद कहीं और ही था, पिया चाहती थी राज ही बात करें, इसलिए पिया ने भी बात नहीं की।

                पिया ने अपना चेहरा गाड़ी के शीशे की तरफ कर लिया था, वो बाहर का नजारा देख रही थी, जिस नजारे को देखने का उसके लिए कोई मतलब नहीं था, या मायने ही नहीं थे।

                अनायाश ही पिया का ध्यान कॉलेज के शुरुआती दिनों में चला गया था, जब राज से मुलाकात हुई थी। जिस दिन राज को पिया के पहली बार देखा था, पिया अपनी हॉस्टल की दोस्तों के साथ कैंटीन में सुबह का नाश्ता करने गयी थी, वहीं राज भी बैठा था, राज को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वो किसी का इन्तजार कर रहा है। पिया नाश्ता खत्म करने के बाद जब कैंटीन से निकली, राज तब भी वहीं बैठा था। कैंटीन से निकलने के बाद पिया की एक दोस्त ने बताया था, ये लड़का कैंटीन में इसलिए अकेला बैठा है, क्योंकि हॉस्टल में रात में ही आया था, उसकी अभी कोई दोस्त नहीं है, इसलिए सुबह आकर कैंटीन में बैठ गया है।

                अगले दिन सोमवार था, लेकिन ये क्या, राज भी पिया की क्लास में था, जब क्लास खत्म होने के बाद सब स्टूडैंट बाहर निकल रहे थे, तभी जल्दी निकलने की हड़बड़ाहट में राज का पैर पिया के दुपट्टे पर रख गया, और ये बात पिया को बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। और इसके बाद पिया ने अजनबी राज को बहुत कुछ सुना दिया। पिया राज को बोले जा रही थी, राज सब कुछ सुनने के बाद बोला यदि आपको इससे तसल्ली मिल रही है, तो और सुना लो, लेकिन जानती तुम भी हो ये सब गलती से हुआ है, फिर भी मैं तहेदिल से आपसे माफी मांगता हूं।

                अगले चार पाँच दिन पिया ने राज को देखा, लेकिन राज किसी से भी बात नहीं करता था, क्लास खत्म होने के बाद अपनी सीट से उठकर सीधे अपने रूम में चला जाता था।

पिया ने यदि राज को क्लास के अलावा कहीं और देखा था तो वह थी कैंटीन, करीब एक महीने तक यूं ही चलता रहा।

                एक दिन राज कैंटीन में बैठा था, पिया भी वहां चाय पीने आयी, लेकिन उस दिन पिया भी अकेली थी। अनायास ही पिया चाय लेने के बाद राज के पास बैठ गई। कुछ देर बाद “तुम राज हो ना, मैं पिया, और उस दिन तुमने जब मेरे दुपट्टे पर पैर रख दिया, उस दिन मैंने तुम्हें खूब सुनाया, मुझे तुमसे वो सब नहीं बोलना चाहिए था। उसके लिए सॉरी”। लेकिन इस पर राज ने बस यही कहा, मैं उसी दिन वो सब भूल गया, और ऐसा भी तुमने कुछ नहीं बोला जिसे मैं अब तक याद रखू।

                राज तुम्हारा यहां कोई दोस्त नहीं है क्या, तुम यहां अकेले कैंटीन में क्यूं बैठे रहते हो। इस पर राज ने कहा, “शायद तुम सही हो, मेरा कोई दोस्त नहीं है, इसलिए कैंटीन में समय निकालने आ जाता हूँ।” इस पर पिया पलट कर कहती है, राज इसे समय निकालना नहीं कहो, इसे समय काटना कहते हैं, और इस तरह तीन साल नहीं निकलेंगे। थोड़ी देर बाद गहरी सांस छोड़ते हुए पिया कहती है, चलो आज से मैं तुम्हारी दोस्त, और पिया अपना हाथ बढ़ा देती है राज की तरफ। और हाँ, आज शाम को मंदिर चलना मेरे साथ, मेरा वृत है आज का।

                राज थोड़ा सा सहमता हुआ कहता है, अगर मैं मना कर दूं तो । मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगीं कैटीन में शाम 5 बजे तक, ऐसा कहते हुए पिया कैंटीन से निकल जाती है ।

                शाम को पाँच बज चुके थे, राज नहीं आया तो पिया कैंटीन में से मायूस होकर निकलने लगी तभी पीछे से आवाज आयी । सॉरी पिया कि मैं थोड़ा लेट हूँ, लेकिन आ गया हूं समय रहते।

                उस दिन राज को बहुत अच्छा लगा, और अगले कुछ दिनों तक सामान्य चलता रहा, जैसे-जैसे दिन निकलते गये, वैसे-वैसे पिया और राज की दोस्ती बढ़ने लगी।

                कुछ दिनों के बाद दोनों की दोस्ती परवान चढ़ चुकी थी, दोनों एक दूसरे की तारीफें करते नहीं थकते थे।

                समय अपने पंख लगाकर उड़ता रहा, और जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, वैसे-वैसे राज पिया की तरफ झुकता जा रहा था। राज को लगाव होता जा रहा था पिया से, उसकी हर एक चीज से, उसकी बातों से। और शायद पिया को भी राज अच्छा लगता था, इसलिए पिया सब-कुछ जानते हुए भी समय के साथ-साथ राज के साथ भी चली जा रही थी।

                समय निकलता गया, पढ़ाई का आखिरी वर्ष चल रहा था,  और यहां तक आते-आते राज को पिया से प्रेम हो ही गया था, राज ने अभी तक अपने प्रेम का इजहार नहीं किया था, ये बात अलग है।

                लेकिन पिया ये भी सोचती थी कि राज अपने प्यार का इजहार ना करे तो ही अच्छा है, क्योंकि पिया अभी करियर पर ध्यान देना चाहती थी, वो नहीं चाहती थी कि अभी से वो इन रिश्तों में पड़े। लेकिन ऐसा सिर्फ पिया का दिमाग सोचता था, जबकि दिल में राज के सिवा कुछ और था ही नहीं, सोते जागते उसका दिल राज के सिवा कहीं और जाता ही नहीं था । लेकिन पिया अपने दिल पर काबू रखकर ज्यादातर दिमाग से काम लेती थी, इसलिए राज के निश्चल प्रेम में कुछ आशंकाऐं प्रतीत होती थी।

                अब कॉलेज से जाने के मात्र चार दिन और बचे थे। राज और पिया कॉलेज के पास ही मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे थे, जहां वे दोनों अक्सर बैठा करते थे। लेकिन उस दिन पिया के साथ रहने पर बेहद खुश दिखने वाला राज का चेहरा मायूस हो रहा था।

                क्या हुआ राज, आज कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। राज कुछ बोला नहीं, बस ना में सिर हिला दिया। पिया जानती थी राज से कुछ पूछना है, तो बस उसे अपनी दोस्ती का एक अहसास दिला दो, तो फिर राज अपने दिल में कुछ नहीं रखेगा । पिया ने वही किया।

                पिया मुझे तुमसे कुछ कहना है। ‘हां तो बोलो ना’

                “पिया मैं जानता हूँ, कि जो मैं बोलने जा रहा हूँ, वो तुम कभी नहीं चाहती कि मैं बोलूं। अब हम कॉलेज से जाने वाले हैं, और तुम जानती हो कि मुझे तुम और तुम्हारा साथ अच्छा लगता है, शायद ये दिल नादानी कर बैठा है, मुझसे बिना पूछे ही मेरा दिल तुम्हारा हो गया है, प्यार हो गया है, तुमसे! जानता हूँ, तुम्हारे पास अभी वक्त तो नहीं है इन सब के लिए, लेकिन मैं ये भी चाहता हूँ, कि मुझे यंहा छोड़कर ना जाओ।

                आई लव यू “पिया”।

                राज जब तुम सब-कुछ जानते ही हो, तो फिर तुमने बहुत बड़ी गलती की ये सब बोलकर, तुम बहुत अच्छे हो, लेकिन सच में मेरे पास वक्त नहीं है,  कि अभी तुम्हारे इन सवालों के जबाव दूँ । और राज मैं मजबूर हूँ, तुमसे बात न करने के लिए, भूल जाओ यहीं सब कुछ, और कॉलेज के बाद एक नई शुरुआत करो।

                राज को धक्का सा लगा, हिम्मत करके कहा, “ क्यूं पिया यहां से जाने के बाद बात भी नहीं, ऐसा क्यूं।“ ऐसा इसलिए राज, क्यूंकि मैं नहीं चाहती कि तुम्हें और परेशानी झेलनी पड़े, जितना मुझसे बात करोगे उतना ही मुझमें और डूबोगे, यदि बात नहीं करूँगी तो मुझे भूलने में आसानी होगी।

                पिया मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं, लेकिन जब तक संभव हो सकेगा, तुम्हारा इंतजार जरूर करूंगा। चाहूंगा कि अपने सपनों को पूरा करने के बाद मेरे पास लौटो।

                राज शायद ये संभव नहीं है। पिया खड़ी हो गई, पिया ने राज से ये सब बोल तो दिया, लेकिन  स्वयं उसके चेहरे की भी हवाइयाँ उड़ चुकीं थीं। पिया दो कदम चलने के बाद रुकी और बिना मुड़े ही कहा, “अच्छा राज मैं जा रही हूं, अपना ध्यान रखना।”  

       “ बाय.........., अब हम कभी नहीं मिलेंगे।“

                लेकिन पिया मैं तुम्हारा इन्तजार करुंगा । राज के शब्दों में दर्द साफ़ झलक रहा था ।  पिया चली गई वहां से, लेकिन उसे ये नहीं पता था कि उसकी आँखों में भी पानी था, ये सब होने के बाद। पिया को उस रात नींद नहीं आयी, और ना ही राज को। लेकिन पिया सिर्फ दिमाग की सुन रही थी।

              और पाँच दिनों के बाद आखिर कॉलेज का अन्तिम दिन भी आ गया। सब लोग जाने की तैयारी कर रहे थे, अपने-अपने घर। सब लोग काफी खुश दिख रहे थे, सिवाय पिया और राज के, और राज तो उन सब लोगों की बीच उपस्थित ही नहीं था।

                पिया की नजरें राज को ढूँढ़ रहीं थीं, लेकिन राज वहां था ही नहीं, तो फिर नजर कैसे आता। सच तो ये था, कि पिया भी राज को चाहती थी, लेकिन पता नहीं उसे कौनसे सपने पूरे करने थे, जिससे उसे लग रहा था, कि राज उसके साथ नहीं होना चाहिए।

                पिया की टैक्सी आ चुकी थी, एकाएक पिया के कदम कॉलेज की कैंटीन की तरफ खिंचे चले गये। पिया का दिल सही था, क्योंकि राज कैंटीन में ही था, और उसी जगह पर जहां पिया ने राज को पहली बार देखा था। पिया ने राज को देखा और चली आयी उन्ही कदमों से, नहीं चाहती थी कि राज भी उसे देखे।

                अचानक ही नींद से जागी पिया और वर्तमान में आ गयी। राज ने अपने घर का ताला खोलने के बाद उसे अन्दर आने के लिए कहा।

                पिया थोड़ा सकपकाई और पूछा, “राज यहां और कोई नहीं है, क्या”, क्या तुम अकेले रहते हो। राज काफी गम्भीर था, पिया अकेला नहीं हूँ मैं यहां, मेरे साथ ये किताबें हैं, जो हमेशा मेरा साथ देती हैं, और कुछ यादें भी, जिनके सहारे मैं जी रहा हूँ, खैर अभी छोड़ो इन बातों को, तुम यहां बैठो, मै नाश्ता तैयार करता हूँ। पिया को कुछ अधिक समझ नहीं आ रहा था, उसे लेकिन ये उम्मीद नहीं थी कि राज उसे इस हालत में मिलेगा।

                पूरे दो साल और एक महीने बाद मुलाकात हुई थी, इतने दिनों के बाद वो लोग उतनी भी बात नहीं कर पाये जितनी 2 घंटे में बिछुड़ने के बाद ही कर लेते थे।

                पिया का दिल अंदर से तड़प रहा था, पिया ने चाहे कितने ही सपने पूरे क्यों ना किये हों। लेकिन वो राज को एक पल के लिए भी नहीं भूल पाई थी, इसलिए चली आयी राज से मिलाने के लिए ।

      राज मुझे कल जाना है, और भी सुबह जल्दी ही निकलना पड़ेगा । राज कुछ पूछता, लेकिन उससे पहले ही पिया बोल पड़ी, “सुबह का टिकट है, और आज के सफ़र से बहुत थक गयी हूँ, इसलिए सोना चाहती हूँ ।” सोचा था बहुत सारी बातें करेंगे, लेकिन क्या करूँ इतना ही समय था मेरे पास।“

      हाँ.. हाँ क्यूँ नहीं, यदि तुम थक गयी हो तो तुम्हे सो जाना चाहिए । राज ने पिया बेडरूम बता दिया, और उसके लिए पानी कि बोतल भी रख दी । “पिया, तुम्हे कैसी भी जरुरत हो तो मुझे जगा सकती हो बेझिझक ।”

      गुड नाईट पिया !

     राज पिया के रूम से चला गया, यही कोई 10 बजे होंगे , राज के वंहा से चले जाने के बाद पिया जैसे धडाम से गिर गयी बिस्तर पर, बहुत से सवाल लिए । पिया को कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसका दिल किसी अनजाने से भय से कांप रहा था, जैसे वो किसी अँधेरे और तंग गलियारे में फंस गयी हो ।

     कशमकश में शायद रात का 1 बज चुका था, और एक नीद थी जो पिया से कोसों दूर मानो उसे चिड़ा रही थी । एक साथ हजारों सवाल पिया के दिमाग में बिजली कि तरह कौंध रहे थे, लग रहा था कि पिया कि चेतना खो गयी थी जैसे ।

     कुछ समझ न आया तो बिस्तर से उठकर खिड़की के पास खडी हो गयी, खिड़की का पर्दा पंखे कि हवा से लहरा रहा था । अचानक पिया कि नजर राज के कमरे की बालकॉनी पर पड़ी और चोंक उठी, क्योंकि उसे बालकॉनी में राज दिखाई दिया, पिया ने लहराते हुए परदे को अपने हाथ से थाम लिया और बाहर बालकॉनी में खड़े हुए राज को पढ़ने कि कोशिश करने लगी, उसका ध्यान आकाश कि तरफ था, राज के शांत चहरे को देखकर लग रहा था, मानो उसके पास बहुत से सवाल हैं, जिन्हें वह पिया से पूछना चाहता है ।

      पिया का दिल भी रो रहा था, और वह चाह रही थी, कि खूब सारा रोये राज से लिपटकर   और मांग ले राज से राज को केवल और केवल पिया के लिए, और साथ में क्षमा भी, जो गुनाह उसने राज से 2 साल ना मिलकर किये थे ।

     और ऐसे ही तमाम और अनसुलझे खयालों को लिए खिड़की के पास में रखी हुई कुर्सी पर बैठकर नींद के आगोश में समा गयी । लेकिन सहसा ही राज कि आवाज से उसकी नींद खुली, राज रूम के बाहर से पिया को जगने के लिए पिया के रूम का दरवाजा खटखटा रहा था । पिया ने नींद और हडबडाहट में जल्दी  से दरवाजा खोला ।

     पिया जगने के बाद कुछ समय में ही अपने घर दिल्ली जाने के लिए तैयार हो चुकी थी, “राज,  क्या मुझे रेलवे स्टेशन तक छोड़कर आयोगे । राज कुछ बोला नहीं, बस हाँ में सिर हिला दिया, सुबह का नाश्ता करने के बाद राज और पिया स्टेशन कि तरफ चल दिए थे । घर से निकलने के बाद स्टेशन का 30 मिनट का फासला था, लेकिन राज और पिया दोनों ने बात करना जरुरी नहीं समझा, हालाँकि ये बात और है , कि बात दोनों चाहते थे कि वे बात करें ।

     स्टेशन पर पहुंचते ही पिया ने राज से कहा, “धन्यवाद राज, अब आप जा सकते हैं, और मेरे आने से यदि तुम्हे किसी भी तरह कि परेशानी हुई हो तो उसके लिए में माफ़ी चाहती हूँ ।”  लेकिन राज बोला, “नहीं पिया, ऐसी कोई बात नहीं है, और मुझे ख़ुशी हुई कि तुमने मुझसे मिलने के लिए समय निकाला, और जब तुम्हे सीट मिल जाएगी तो में चला जाऊंगा ।”

      पिया अब राज को पहली तरह मना तो कर नहीं सकती थी, लेकिन थी बहुत असमंजस में, क्यूंकि पिया के पास वंहा से जाने के लिए कोई टिकेट नहीं था ।

      हालाँकि कल जब पिया ने कॉल किया था, तब वो बहुत नखरे दिखा रही थी, और साथ में गुस्सा भी , लेकिन जब से राज से मिली है, उसके बाद से उसका सारा गुस्सा, नखरे और शिकायतें ख़त्म हो चुंकी हैं ।

     हाँ ये बात सही है, कि पिया राज के साथ थोडा सा वक्त बिताने आयी थी, जानने आयी थी कि राज कैसे रहता है उसके बिन, देखने आयी थी कि राज को सच में उससे प्यार था, या फिर साथ रहने का आकर्षण था, जो समय के साथ ख़त्म हो जाता है । लेकिन राज से मिलकर लगा कि उससे कुछ ना बोल पायेगी, इसलिए आज ही जा रही है ।

        ‘राज तुम चले जाओ’, अबकी बार पिया थोड़ा सा जोर से बोली क्योंकि वह चाहती थी राज चले जाएं, नहीं तो कहीं राज को पता चल गया कि उसके पास टिकट नहीं है तो राज क्या सोचेगा।

                पिया तुम्हारे पास कोई टिकट नहीं है, पता है मुझे। मैं टिकट ले लूंगा तुम्हारी, और कोई सवाल भी नहीं पूछूंगा, तुम्हारे दिल के किसी कोने में आज भी मेरे लिए जगह है, इससे अधिक मेरे लिए खुशी कुछ और नहीं हो सकती है।

                तुम रात को अधिक थके हुए थे, इसलिए तुम्हें जगाना उचित नहीं समझा यदि संभव हो तो कभी और आना, और थोड़ा सा समय देना।

                राज का चेहरा बिल्कुल शान्त था, हंसने की कोशिश करता हुआ बोला, “और शादी में नहीं बुलाओगी”।

                थोडा सा बोलने के बाद राज ने शायद बातें जान बूझकर बंद कर दी थी, लेकिन पिया चाहती थी कि राज बोलते रहें, और कुछ ऐसा बोल जाए, जिस पर वह बता सके कि वह राज से क्यूं मिलने आयी है।

                थोड़ी देर तक दोनों शान्त थे। पिया समझ चुकी थी, कि राज अब कुछ नहीं बोलेगा, तो उसी ने हिम्मत जुटाई।

                ‘राज तुम्हें कैसे पता है कि मेरे पास कोई टिकट नहीं है’।

                ‘छोड़ो पिया इन सब बातों को’

                ‘नहीं राज, तुम्हें बताना चाहिये, आखिर मैं तुम्हारी दोस्त हूँ’।

                “पिया तुम्हारा दोस्त हूँ, तुम्हें जानता हूँ, तुमने अपना दिल बदल थोड़ी लिया है, जिसे मैं समझ नहीं पाऊँ, और फिर तुम पागल जो हो।”

                “राज, जब सब तुम्हें पता है, तो फिर मैं तुमसे क्यूं मिलने आयी हूँ, ये भी पता होगा” । राज ने सब कुछ जानते हुए भी यही कहा कि क्या फर्क पड़ता है  पिया, अब तुम्हारे लिए, और फिर जिस बात को मुझसे बोलने आयी हो, तो फिर तुम भी तो बता सकती हो उस बात को, सिर्फ मेरे समझने और जानने से क्या होगा।

                पिया ने थोड़ी सी हिम्मत जुटाई, “राज मैंने तुमसे कॉलेज से जाने के वक्त कहा था कि अभी मेरे पास तुम्हारे लिए वक्त नहीं है।”

                राज ने हाँ में सिर हिला दिया।

                राज, आज मेरे पास वक्त है, तुम मेरे पापा से बात कर सकते हो।

                पिया ने गले लगा लिया राज को, और रोने लग गयी, और रोते हुए ही बोली, “राज करोगे ना पापा से बात मेरे और अपने लिए । पिया बोले जा रही थी और साथ भी उसके आंसु भी नहीं रुक रहे थे ।

                2 महीने बाद।

                पिया के घर मंगल गीत चल रहे थे, बैंड वाले बैंड बजा रहे थे, लेकिन उनका ध्यान उन पैसों पर ज्यादा था जो उन्हें शगुन में मिल रहे थे। तभी उस शोर में से आवाज आयी, बारात आ गयी है, तैयार कर लो आगे की।

 

                पिया की दोस्त पिया से हंसी ठिठोली कर रहीं थी, कि कल तो पिया चली जाएगी। पिया शर्म से लाल हो गई और अपने हाथों से ही अपने चेहरे को छुपाने की कोशिश करने लगी, क्योंकि आज राज उसके घर आया है, उसे लेने, उसे अपनी बनाने के लिए।

                हवन कुंड तैयार था, जिसकी अग्नि की ज्वाला को साक्षी मानकर राज पिया को अपनाएगा।

 

                                                “समाप्त”

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