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जिंदगी........एक अधूरा सफ़र

अध्याय-4

अगले दिन यानी 11-10-1989 के दिन, उनका पर्स मैंने लौटा दिया था, और साथ में अपने कुछ पैसे और बैंक का सबसे जरूरी कागज उनके पर्स में रख दिये थे। उस दिन काम की व्यस्तता के चलते हमारी ज्यादा बात नहीं हुर्इ।

12-10-1989 की सुबह, राज सीधे मेरे पास आए और बोले “पिया, तुम जानती हो ना, कि मैं कितना लापरवाह हूँ।” मैंने पूछा “क्या हुआ राज”, तो बोले “पिया, तुमने अपना जरूरी कागज मेरे पर्स में रख दिया और पैसे भी, पैसे की तो कोर्इ बात नहीं लेकिन तुम्हारा ये बैंक वाला फॉर्म इधर-उधर हो जाता तो”, इसपर मैं बोली गलती से रख दिया था। राज ने वो फॉर्म मेरे पर्स में रख दिया, और बोले “चलो, पिया चाय पीने चलते हैं।”

चाय वाले भैया ने दो चाय बना दीं, हम चाय पी रहे थे, तभी बीच में राज बोले “पिया, झूठ ऐसा बोला करो, जिसे मैं पकड़ ना सकूं” मैंने नज़रें नीचे झुका ली, क्योंकि वो सही थे। लेकिन मैं क्या करती मुझे अच्छा लगता था उनके साथ ये सब करना।

16-10-1989 के दिन राज ने मेरे गालों पर आ रही लट को अपने हाथ से हटाते हुए बोले, पिया, तुम्हें खुले हुए बाल ज्यादा अच्छे लगते हैं”, मैं बोली क्या बोलते रहते हो राज। “पिया, सही बोल रहा हूँ, तुम बहुत खूबसूरत लगती हो, खुले हुए बालों में”। पागल हो क्या राज तुम जो मन में आया बोलते रहते हो शर्म और हया नाम की कोर्इ चीज है या नहीं तुम्हारे अन्दर, मैंने लगभग शिकायती लहजे में ये सब कहा, पिया तुम कह सकती हो पागल, लेकिन जब ये रोज-रोज पागल कहना ही था, तो फिर मुझे पागल बनाया क्यों” राज के ये शब्द इतने अच्छे लग रहे थे कि कर्इ दिनों तक मेरे कानों में गूँजते रहे, कि “तो फिर पागल बनाया ही क्यों”।

जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे, वैसे-वैसे राज का आकर्षण मेरी तरफ बढ़ता ही जा रहा था, वो मुझ पर अपनी जिम्मेदारियां छोड़ते जा रहे थे, क्योंकि वो मुझे अपना समझने लगे थे, और ये सही भी था, क्योंकि राज मुझसे प्यार जो करते थे।

इसी बीच राज मुझसे छोटी-छोटी शिकायतें भी करने लग गये थे, हालाँकि वो शिकायतें सही थीं, क्योंकि शिकायत सिर्फ उनसे की जाती है, जिससे प्यार होता है, अपनापन होता है, लेकिन पता नहीं उनकी शिकायतें मुझे अच्छी नहीं लगती थीं। मुझे लगता था कि राज मुझसे सिर्फ पोजेटिव बातें करें।

राज जानते थे कि पिया को शिकायतें अच्छी नहीं लगती, इसलिए वो मुझे चिढ़ाने के लिए भी शिकायतें करने लगे। मैं भी जानती थी कि राज मुझे चिढ़ा रहे हैं, इसलिए मैं भी उनसे नाराज होने का बहाना बनाती।

पिया, जो तुम्हें करना है करो, लेकिन मुझसे नाराज मत हुआ करो” राज की इस बात पर मैं फिर से नाराज होती हुर्इ बोली तो “राज, आप मुझसे शिकायत ना किया करो”। “देखो पिया तुम मेरी अच्छी दोस्त हो, इसलिए जो मुझे अच्छा नहीं लगता तो मैं तो तुम्हें बोलूंगा” इसपर मैंने कहा “राज मैं भी आपसे नाराज रहूंगी क्योंकि नाराज भी दोस्तों से ही हुआ जाता है”।

खैर प्यार में ये सब चलता रहता है, हम दोनों एक-दूसरे को प्यार करते थे, हालांकि अभी तक प्यार का इजहार नहीं हुआ था, और ये भी सही है कि राज मुझसे कहीं अधिक प्यार करते थे मुझे।

28-10-1989, राज का फोन आया था घर से, फोन रखकर मुझसे बोले “पिया, मुझे जाना होगा घर, कुछ जरूरी काम है”। मैंने राज से पूछा “क्या हुआ ऐसे क्यों बोल रहे हो”, राज ने कहा “कोर्इ रिश्ता आया है, और मुझसे मिलना चाहते हैं,” उनका ये कहना ही था कि मेरी आँखों के सामने सब कुछ घूमने लग गया था, मैं अस्थिर होती जा रही थी। एक अकल्पनीय डर, जिससे बचने का कोर्इ उपाय नहीं सूझ रहा था, लग रहा था जैसे किसी ने बहुत भारी पत्थर रख दिया है मेरे ऊपर, और उस पत्थर के वजन के कारण मैं कुर्सी से उठ भी नहीं पा रही थी, शब्द निकल ही नहीं पा रहे थे बोलने के लिए, लग रहा था कि जीभ के अन्दर खून का संचार ही नहीं है, कैसे बोलूं कुछ।

एक मिनट के मौन के बाद हिम्मत करके बोली “तो जाओ ना फिर, मैं क्या करूँ, और ये सब मुझे क्यों बता रहे हो”। मैं अपनी जगह पर बैठी रही। चन्द मिनटों में मेरे सपने चूर-चूर हो गये थे, उस दिन और काम करने का मन नहीं किया। राज को बिना बताए ऑफिस से निकल गर्इ थी घर के लिए।

घर जाने में मुझे करीब एक घंटा लगता था, लेकिन उस दिन वो एक घंटा लग रहा था जैसे बीत ही नहीं पा रहा है। मेरी आँखों के सामने सपने में कहे हुए पापा के शब्द “बेटा फिर मुझसे शिकायत मत करना” बार-बार गूंज रहे थे, दूसरी तरफ राज से नफरत होती जा रही थी।


 

कितने मतलबी लोग रहते हैं, किसी की भी भावनाओं से खेलते हैं, बिना कुछ सोचे समझे। हाँ यही सोच रही थी, मैं उस वक्त राज के लिए, लेकिन दूसरे पल खयाल आ रहा था, कि राज ने मुझे अपने प्यार का इजहार नहीं किया है, और उन्होंने तो कुछ मतलब भी नहीं निकाला, तो फिर क्यों सोच रही हूँ, किसी के लिए ये सब, हो सकता है राज सिर्फ मुझे अपनी अच्छी दोस्त समझते हों।

उस दिन हर पल मेरे अन्दर एक नया खयाल आ रहा था, ठीक से किसी एक बात को नहीं सोच पा रही थी, कभी राज से नफरत हो रही थी, तो कभी सोच रही थी कि राज बस दोस्त है। लेकिन ये तय था कि मेरे हर नया खयाल सिर्फ राज को लेकर था, घूम-फिरकर मेरा दिमाग राज पर ही रूक रहा था, उन्हीं पर बार-बार सोचने पर मजबूर कर रहा था।

राज का अगले दिन फोन नहीं आया, उसके अगले दिन भी फोन नहीं आया, फिर उसके अगले दिन लगा आज राज ऑफिस आएंगे तो उनसे बात ही नहीं करूँगी, लेकिन ना तो राज आये और ना ही उनका कोर्इ फोन। वो तीन दिन मुझे ऐसे लगे थे जैसे तीन साल हो। वक्त को कितने मुश्किल से निकाला था ये सिर्फ मैं ही जानती थी।

1-11-1989, राज आये ऑफिस में, मैंने अब सोच लिया था कि मैं राज से बात नहीं करूँगी, लेकिन राज मेरे पास आए, जिस जगह में ऑफिस में बैठती थी, और बोले “देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ” मेरा बिल्कुल मन नहीं था कि मैं राज से नजरें मिलाकर बात करूँ, इसलिए बैठे-बैठे ही बोल दिया हो गर्इ आपकी सगार्इ, आ गर्इ तुम्हें लड़की पसन्द, मेरे कहने पर राज ने कहा “हाँ, ऑफिस का नम्बर दे दिया है, कर लेगी मुझे फोन पर बात, उनके इतना कहने पर मुझे और भी गुस्सा आ गया लेकिन अब मैं उन्हें अपना गुस्सा दिखाना नहीं चाहती थी, आखिर लगते ही क्या थे मेरे, क्या अधिकार था मेरा उनपर जो इन्हें अपना गुस्सा दिखाऊँ, जैसा मैंने अब तक उनके बारे में सोचा था ऐसे तो वो थे ही नहीं।

मेरी आँखों में आंसू थे उस दिन, लेकिन क्या वजह थी मेरे आंसूओं की, किसी को क्या बताती, जो रिश्ता बना ही नहीं तो वो टूटेगा कैसे, इसलिए मैंने सब से अपना दर्द छिपा ​लिया, नहीं बताया किसी को कुछ भी, उस दिन लग रहा था कि मेरे पापा साथ हो बस और जैसा वो बोलेंगे वही करूँगी मैं।

अगले दिन यानी 2-11-1989 को राज ने मुझे बताया “पिया मैं तुमसे मजाक कर रहा था, मैं तुम्हारी नाराजगी देखना चाहता था, इसलिए तुम्हें सब सही नहीं बताया” मैं राज की इस बात से हतप्रभ सी रह गर्इ, और बोली कैसा मजाक। “पिया, दरअसल मैंने सगार्इ के लिए मना कर दिया है, मुझे नहीं करनी शादी”, मैं उससे शादी करूँगा जिससे मैं प्यार करता हूँ, और वो भी मुझे प्यार करती है”। मैंने पूछा कौन है वो, जिससे आप प्यार करते हो, इस पर राज बोले “पिया उसे तुम जानती हो” मैंने अंजान बनने की कोशिश की और कहा, क्यूँ मैं क्यों जानूंगी उसे” लेकिन सच में, मैं उसे जानती थी । क्योंकि जिसे राज प्यार करते थे वो मैं ही थी।

समय आने पर तुम्हें बता दूंगा, पिया” । धीरे-धीरे समय निकलता गया, फिर से हमारी वही पुरानी बातें शुरू हो गयीं थीं, लेकिन राज के वो चार दिन जब उन्होंने मुझसे बात नहीं की, वो मुझे एक बार सोचने पर मजबूर करते थे, कि क्या राज के मन में कुछ और है। जो मुझे बताना नहीं चाह रहे, इसलिए अब मैं राज को लेकर अधिक गहरार्इ में सोचने लग गर्इ थी। और जब भी वो पापा के शब्द, जो सपने में कह रहे थे “बेटा फिर मुझसे शिकायत मत करना” तो सोचती कि मैं राज की नहीं हो पाउंगी, इसलिए मैं राज से थोड़ी दूरी बनाने लग गयी थी, और उनसे अब बातें भी छिपाने लग गयी थी।

ऐसा भी नहीं था कि राज से मुझे नफरत हो गयी थी, या राज से बातें करना छोड़ दिया था, बस अब मैं राज के अलावा ऑफिस में और लोगों के साथ भी थोड़ा वक्त बिताने लग गयी थी।

मैं राज के अलावा ऑफिस के और लोगों से थोड़ी सी बात करने लगी थी, इसलिए और लोग भी मुझसे ज्यादा बात करने लग गये थे । ये बात भी थी, कि कर्इ लोग मेरी और राज की दोस्ती से जलते भी थे, इसलिए बातों-बातों में मुझसे राज की बुरार्इ भी करते थे, हालांकि वे बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थी, लेकिन मैं किसी को कुछ बोलती भी नहीं थी।

ये सारी बातें राज को पता थीं कि किसका कैसा व्यवहार है, इसलिए राज मुझसे कर्इ लोगों के बारे में बोलते थे, कि इससे ज्यादा बातें ना किया करो या उस पर अधिक विश्वास मत करना, मुझे राज पसन्द था, लेकिन उनकी ये बात कि ये मत किया करो, वो मत किया करो, या उससे बात मत किया करो, ये सब मुझे अच्छा नहीं लगता था, और उनका बात-बात पर रोकना या मना करना मुझे राज से थोड़ा सा दूर करता जा रहा था।

20-11-1989, राज मुझसे बोले, पिया आज ऑफिस से निकलने के बाद मेरे साथ चलना और घर पर बोल देना कि मैं थोड़ा देर से घर आऊँगी, मैंने पूछा कि क्या हुआ तो वे बोले “क्योंकि आज हम खाना खाने जा रहे हैं, पास में एक अच्छी होटल है।

मैंने सोचा कि मुझे बिना बताए ही फैसला कर लिया कि, हम खाना खाने जा रहे हैं, तो ये बात मुझे सही नहीं लगी और राज से बोल दिया कि, नहीं राज, आज ऑफिस में काम अधिक है”, और तुम्हें पता है ना, मुझे घर भी बहुत दूर जाना होता है, तो मैं आज तुम्हारे साथ नहीं चल सकती, उस दिन मैं राज के साथ खाने पर नहीं गर्इ, लेकिन मैं ऑफिस से जल्दी घर के लिए निकल गर्इ थी। और ये बात कि, मैं उस दिन ऑफिस से जल्दी निकल गर्इ, राज को बिल्कुल भी सही नहीं लगी तो दूसरे दिन 21-11-1989 को मुझे बोले “पिया, कुछ और काम था या जाने का मन नहीं था, तो सीधे बोल देते, काम का बहाना बनाकर झूठ बोलने की क्या जरूरत थी”। तो उनके ऐसा कहने पर मैं बोली “राज, मेरी अपनी भी जिंदगी है, मैं कुछ भी करूं तुम्हें क्या” मेरे ऐसा कहने पर राज को गुस्सा आ गया था, लेकिन उन्होने कुछ कहा नहीं, बस मेरे पास से उठकर चले गये।

राज ने मुझसे चार दिन बात ना करके जो मुझसे मजाक किया था, उसे मैं एहसास दिलाने की हरसंभव कोशिश करने लग गयी, और इसलिए मैं उनसे थोड़ा सा अधिक नाराज होने लग गर्इ थी।

29-11-1989 के दिन मेरे साथ एक दुर्घटना हो गर्इ और मेरे पैर में चोट लग गर्इ, इसके बाद जब राज को पता चला कि मुझे चोट लग गर्इ है, तो उन्होंने मुझसे फोन पर बातें की, उन बातों से ऐसा लग रहा था कि चोट मुझे लगी है लेकिन दर्द राज को हो रहा है। तीन-चार दिनों के बाद जब मेरी चोट सही हुर्इ और मैं ऑफिस गर्इ तो राज मेरे पास 2 घंटे बैठे रहे थे, अपना सब काम छोड़कर।

उनकी मासूमियत झलक रही थी, और ये मासूमियत ही राज को अधिक खूबसूरत बनाती थी, तब कुछ समय के लिए मैं राज की सारी शिकायतें भूल गर्इ थी, कुछ दिनों के लिए उनपर फिर से मेरा आकर्षण हो गया था। शायद राज का मुझे मासूम व्यवहार ही अच्छा लगता था, उनकी मेरे लिए परवाह ही मुझे उनसे जोड़ती थी l

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